Bhagavad gita chapter 2

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 – सांख्ययोग (ज्ञानयोग)

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 (यह अध्याय 72 श्लोकों का है) यह अध्याय गीता का हृदय कहलाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह, करुणा और भ्रम का नाश करते हुए उसे कर्तव्य, आत्मा का स्वरूप, कर्मयोग, समत्वयोग, और ज्ञानयोग की शिक्षा देते हैं।

श्लोक 1

सञ्जय उवाच ।
तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ 1 ॥

भावार्थ:
संजय बोले — उस प्रकार करुणा से अभिभूत, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, विषादग्रस्त अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कहा।

विस्तृत तात्पर्य:
यह अध्याय वही क्षण दिखाता है जब अर्जुन का मन मोह और शोक से भर गया। वह करुणा, दया और भ्रम में फँस चुका था। श्रीकृष्ण अब उसे ज्ञान देने वाले हैं, जो मानव जीवन का सार है — कर्तव्य से विमुख न होना, धर्म के अनुसार कर्म करना और आत्मा के स्वरूप को समझना।

श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच ।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ 2 ॥

भावार्थ:
भगवान बोले — हे अर्जुन! यह मोह तुझ पर इस विषम परिस्थिति में कैसे छा गया? यह आर्य पुरुषों के योग्य नहीं, न स्वर्ग दिलाने वाला है और न कीर्ति देने वाला।

तात्पर्य:
भगवान अर्जुन को झकझोर रहे हैं — धर्मयुद्ध से भागना कायरता है। वीर का धर्म है कि वह अन्याय का प्रतिकार करे। जब मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख होता है, तब उसका पतन होता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को जाग्रत करते हैं कि यह विषाद न धर्म है, न करुणा — यह दुर्बलता है।

श्लोक 3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ 3 ॥

भावार्थ:
हे पार्थ! इस नपुंसकता को मत अपनाओ, यह तुझ पर शोभा नहीं देती। हे परंतप! इस तुच्छ हृदयदौर्बल्य को त्यागो और युद्ध के लिए उठ खड़े हो।

तात्पर्य:
यह उपदेश हर मनुष्य के लिए है। जब जीवन में संघर्ष आए, तब पीछे हटना नहीं चाहिए। भगवान अर्जुन को साहस देते हैं — कर्म ही धर्म है। मन का भय और मोह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। सच्चा साधक वही है जो कठिनाइयों में भी धर्मनिष्ठ बना रहे।

श्लोक 4

अर्जुन उवाच ।
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ 4 ॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! मैं भीष्म और द्रोण जैसे पूज्यजनों पर बाण कैसे चला सकता हूँ?

तात्पर्य:
अर्जुन अपने प्रेम और कर्तव्य के बीच फँसा है। उसके गुरु और पितामह विरोधी सेना में हैं। लेकिन धर्मयुद्ध में यह संबंध गौण हैं। श्रीकृष्ण आगे यह सिखाएँगे कि कर्म आत्मा के भाव से नहीं, धर्म के नियम से करना चाहिए।

श्लोक 5

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ 5 ॥

भावार्थ:
इन महानुभाव गुरुजनों को मारकर जीने से तो भिक्षा खाकर जीना अच्छा है, क्योंकि उन्हें मारकर जो धन मिलेगा वह उनके रक्त से सना होगा।

तात्पर्य:
यह अर्जुन की करुणा का चरम रूप है — पर यह करुणा विवेकविहीन है। धर्मयुद्ध में अन्याय के पक्ष में रहने वाले गुरु भी त्याग योग्य हैं। भगवान आगे बताएँगे कि सच्ची करुणा वह है जो न्याय और सत्य की रक्षा करे।

श्लोक 6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ 6 ॥

भावार्थ:
हमें यह भी नहीं पता कि क्या उचित है — हम जीतेंगे या वे। जिनको मारना नहीं चाहते, वे ही हमारे सामने खड़े हैं।

तात्पर्य:
यह मानव जीवन का सामान्य संकट है — जब निर्णय कठिन हो जाता है, तो मन मोह में पड़ जाता है। अर्जुन धर्म और संबंधों के बीच भटक रहा है। कृष्ण उसे सिखाएँगे कि आत्मा अमर है, कर्म शाश्वत है, इसलिए मोह छोड़कर कर्तव्य करो।

श्लोक 7

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ 7 ॥

भावार्थ:
मैं मोह और कायरता से ग्रस्त हूँ, धर्म के निर्णय में भ्रमित हूँ। अब मैं आपका शिष्य हूँ, कृपया मुझे वह बताइए जो मेरे लिए कल्याणकारी है।

तात्पर्य:
यहाँ अर्जुन का रूप एक शिष्य के रूप में बदलता है। वह अब अहंकार छोड़कर समर्पित है। यही वह क्षण है जब गीता का वास्तविक उपदेश प्रारंभ होता है। जब मनुष्य गुरु के शरणागत होकर ज्ञान चाहता है, तब ही उसे सच्चा मार्ग मिलता है।

श्लोक 8

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ 8 ॥

भावार्थ:
मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो मेरे इंद्रियों को सुख देने वाले इस शोक को दूर कर सके, भले ही मुझे पृथ्वी या स्वर्ग का राज्य मिल जाए।

तात्पर्य:
अर्जुन के शब्द दिखाते हैं कि सांसारिक सुख दुःख का निवारण नहीं कर सकते। जब तक मनुष्य आत्मा का स्वरूप नहीं जानता, तब तक शोक बना रहता है। श्रीकृष्ण उसे बताएँगे कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है — वही ज्ञान शोक का अंत करता है।

श्लोक 9

सञ्जय उवाच ।
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ 9 ॥

भावार्थ:
संजय बोले — इस प्रकार कहकर अर्जुन, जो निद्रा पर भी विजय पाने वाला था, श्रीकृष्ण से बोला कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा” और मौन हो गया।

तात्पर्य:
अर्जुन जैसे वीर का मौन उसकी निराशा और भ्रम को दर्शाता है। लेकिन जीवन के संघर्षों में मौन या पलायन कोई समाधान नहीं। अब भगवान उसे ज्ञान देंगे — जो हर मनुष्य के लिए मार्गदर्शक है।

श्लोक 10

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ 10 ॥

भावार्थ:
हे भारत! उस विषादग्रस्त अर्जुन से, दोनों सेनाओं के मध्य हृषीकेश (कृष्ण) ने मुस्कुराते हुए कहा।

तात्पर्य:
भगवान की मुस्कान इस बात का संकेत है कि वे इस मोह को तुच्छ मानते हैं। जब मनुष्य संसार के दुःखों को बहुत बड़ा मानता है, भगवान जानता है — यह सब अज्ञान का परिणाम है। अब वह अर्जुन को उस ज्ञान की ओर ले जा रहे हैं जो अमर और अविनाशी है।

श्लोक 11

श्रीभगवानुवाच ।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ 11 ॥

भावार्थ:
भगवान बोले — तू जिनके लिए शोक कर रहा है, उनके लिए शोक योग्य नहीं है, फिर भी तू बुद्धिमान जैसी बातें करता है। वास्तव में ज्ञानी न जीवित के लिए शोक करते हैं, न मृत के लिए।

तात्पर्य:
यही गीता का प्रथम उपदेश है — आत्मा अमर है। मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। ज्ञानी व्यक्ति यह जानकर न शोक करता है, न भय। यही सांख्ययोग का प्रारंभ है — आत्मा और शरीर का भेद समझना।

श्लोक 12

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ 12 ॥

भावार्थ:
कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं, तुम या ये सब राजा न थे और भविष्य में भी हम सब नहीं रहेंगे — ऐसा नहीं होगा।

विस्तृत तात्पर्य:
यहाँ भगवान आत्मा की अमरता का सिद्धांत देते हैं। आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है — वह सनातन है। शरीर बदलता है, पर आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। यही ज्ञान शोक का अंत करता है। भगवान कह रहे हैं — ‘हे अर्जुन! यह युद्ध केवल शरीरों के परिवर्तन का माध्यम है, आत्मा अमर है।’

श्लोक 13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ 13 ॥

भावार्थ:
जैसे शरीर में बाल्यावस्था, यौवन और वृद्धावस्था आती है, वैसे ही मृत्यु के बाद आत्मा दूसरे शरीर को प्राप्त होती है। ज्ञानी व्यक्ति इस परिवर्तन से भ्रमित नहीं होता।

तात्पर्य:
जीवन परिवर्तनशील है — शरीर बदलता है, लेकिन “मैं” नहीं बदलता। आत्मा अमर है। यह समझने वाला व्यक्ति मृत्यु या जन्म से भयभीत नहीं होता। जीवन का सत्य यही है — आत्मा का अस्तित्व सदा एक-सा रहता है, जैसे वस्त्र बदलना।

श्लोक 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ 14 ॥

भावार्थ:
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और उनके विषयों के संपर्क से ही सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं। ये अनित्य हैं, इसलिए धैर्यपूर्वक सहन करो।

तात्पर्य:
जीवन के सुख-दुःख अस्थायी हैं। जैसे ऋतुएँ आती-जाती हैं, वैसे ही परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। ज्ञानी मनुष्य उनमें विचलित नहीं होता। जो स्थिर रहता है, वही कर्मयोगी बनता है।

श्लोक 15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ 15 ॥

भावार्थ:
हे श्रेष्ठ पुरुष! जिसे सुख-दुःख विचलित नहीं करते और जो धैर्यवान रहता है, वही अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

तात्पर्य:
जो व्यक्ति हर स्थिति में समान रहता है, वही आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। भगवान यहाँ सिखाते हैं — भावनात्मक स्थिरता ही आध्यात्मिकता का प्रथम चरण है। सुख-दुःख में समभाव रखना ही योग है।

श्लोक 16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ 16 ॥

भावार्थ:
असत् (जो मिथ्या है) का अस्तित्व नहीं और सत् (जो सत्य है) का अभाव नहीं होता। यह सत्य तत्वदर्शी लोग जानते हैं।

तात्पर्य:
यह गीता का दार्शनिक शिखर है। शरीर असत् है — नाशवान। आत्मा सत् है — अविनाशी। ज्ञानी मनुष्य इस भेद को जानता है, इसलिए वह माया के भ्रम में नहीं पड़ता।

श्लोक 17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ 17 ॥

भावार्थ:
जो सबमें व्याप्त है वह अविनाशी है, और उस आत्मा का विनाश कोई नहीं कर सकता।

तात्पर्य:
आत्मा ईश्वर का अंश है — इसलिए वह शाश्वत है। न आग जला सकती है, न पानी गीला कर सकता है। यह सत्य जानने पर मनुष्य भय और शोक से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ 18 ॥

भावार्थ:
ये शरीर नाशवान हैं, परंतु आत्मा अनाशीन और अगम्य है। इसलिए हे भारत! तू युद्ध कर।

तात्पर्य:
भगवान का स्पष्ट आदेश — जब आत्मा अमर है, तब कर्तव्य से पलायन क्यों? शरीर का नाश तो निश्चित है। इसलिए धर्मयुद्ध करना ही अर्जुन का कर्म है। यही कर्मयोग का आधार है।

श्लोक 19

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ 19 ॥

भावार्थ:
जो आत्मा को मारने वाला या मरा हुआ समझता है, वह अज्ञान है। आत्मा न किसी को मारती है, न स्वयं मारी जाती है।

तात्पर्य:
मृत्यु केवल शरीर का अंत है। आत्मा शाश्वत ऊर्जा है — यह कर्मफल के अनुसार नए शरीर में जाती है। जो इस सत्य को जान लेता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 20

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ 20 ॥

भावार्थ:
आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और न मरती है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी वह नाश नहीं होती।

तात्पर्य:
भगवान यहाँ आत्मा की शुद्धता को स्पष्ट करते हैं। वह नित्य, चेतन और अमर है। मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। आत्मा को मारने या बचाने की चिंता निरर्थक है। यही ज्ञान अर्जुन को युद्ध के लिए साहस देता है।

श्लोक 21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ 21 ॥

भावार्थ:
जो जानता है कि आत्मा अविनाशी, अजन्मा और नित्य है, वह किसी को कैसे मार सकता है या मरवा सकता है?

तात्पर्य:
भगवान अर्जुन को बोध करा रहे हैं — “तू केवल साधन है, कर्ता नहीं।” आत्मा अकर्ता है, शरीर मात्र माध्यम है। जब यह समझ आता है, तब कर्म बंधनमुक्त हो जाता है।

श्लोक 22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ 22 ॥

भावार्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।

तात्पर्य:
यह आत्मा के पुनर्जन्म का सुन्दर उदाहरण है। मृत्यु वस्त्र बदलने जैसा है। इसलिए प्रियजन की मृत्यु पर शोक करना अज्ञान है। ज्ञानी समझता है कि आत्मा केवल नया रूप ले रही है।

श्लोक 23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ 23 ॥

भावार्थ:
आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है, न अग्नि जला सकती है, न जल गीला कर सकता है, न वायु सुखा सकती है।

तात्पर्य:
आत्मा अजर-अमर, अविनाशी और दिव्य है। भौतिक तत्व उस पर प्रभाव नहीं डालते। यह ज्ञान मनुष्य को स्थिर बनाता है — वह जानता है कि कोई बाहरी शक्ति आत्मा को हानि नहीं पहुँचा सकती।

श्लोक 24

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ 24 ॥

भावार्थ:
आत्मा न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है, न गीली की जा सकती है, न सुखाई जा सकती है। वह नित्य, सर्वव्यापक, स्थिर, अचल और सनातन है।

तात्पर्य:
भगवान आत्मा की दिव्यता को बार-बार दोहरा रहे हैं ताकि अर्जुन का भ्रम मिटे। जब मनुष्य समझ लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप आत्मा है, तो वह न हानि से डरता है, न मृत्यु से।

श्लोक 25

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ 25 ॥

भावार्थ:
आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य है, इसलिए तू इसके लिए शोक करने योग्य नहीं है।

तात्पर्य:
आत्मा इन्द्रियगोचर नहीं — उसे देखा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। जो आत्मा को जानता है, वह जानता है कि मृत्यु केवल एक परिवर्तन है, अंत नहीं।

श्लोक 26–27

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ 26 ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 27 ॥

भावार्थ:
यदि तू आत्मा को जन्म और मृत्यु वाला भी माने, तब भी शोक का कोई कारण नहीं, क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरा है वह पुनः जन्म लेगा।

तात्पर्य:
भगवान तर्क के स्तर पर समझा रहे हैं — मृत्यु और जन्म प्रकृति का नियम हैं। इस अपरिहार्य सत्य पर शोक करना अज्ञान है। बुद्धिमान वही है जो इन परिवर्तनों से अडिग रहता है।

श्लोक 28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ 28 ॥

भावार्थ:
सभी जीव प्रारंभ में अव्यक्त (अदृश्य) हैं, मध्य में व्यक्त (दृश्य) होते हैं और अंत में फिर अव्यक्त हो जाते हैं — इसमें शोक की क्या बात?

तात्पर्य:
जैसे बादल आते हैं, वर्षा करते हैं और विलीन हो जाते हैं, वैसे ही जीवन आता है और चला जाता है। आत्मा इस चक्र से परे है। यह समझने वाला व्यक्ति मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 29

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 29 ॥

भावार्थ:
कोई आत्मा को आश्चर्य से देखता है, कोई उसके विषय में आश्चर्य से बोलता है, कोई सुनता है, पर कोई भी उसे पूरी तरह नहीं जान पाता।

तात्पर्य:
आत्मा का स्वरूप अद्भुत है। इसे केवल तर्क से नहीं, अनुभव से जाना जा सकता है। यही ज्ञान का परम लक्ष्य है। जब मनुष्य स्वयं को आत्मा रूप में देखता है, तो उसे ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

श्लोक 30

देही नित्यं अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 30 ॥

भावार्थ:
हे भारत! शरीर में स्थित आत्मा सदा अवध्य है, इसलिए तू किसी भी प्राणी के लिए शोक न कर।

तात्पर्य:
भगवान बार-बार अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि आत्मा को कोई मार नहीं सकता। अतः युद्ध में मारे गए योद्धा नष्ट नहीं होंगे। यह ज्ञान मनुष्य को निर्भय बनाता है।

श्लोक 31

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ 31 ॥

भावार्थ:
अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर तू विचलित न हो, क्योंकि धर्मयुद्ध से बढ़कर क्षत्रिय के लिए और कोई कल्याणकारी कर्म नहीं।

तात्पर्य:
यहाँ कर्मयोग का सूत्र है — अपने धर्म के अनुसार कार्य करना ही सर्वोच्च कर्तव्य है। अर्जुन का धर्म युद्ध करना है। धर्म से पलायन पाप है, चाहे कारण कितना भी भावनात्मक क्यों न हो।

श्लोक 32

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ 32 ॥

भावार्थ:
हे पार्थ! अपने आप प्राप्त ऐसा युद्ध क्षत्रियों के लिए स्वर्ग का द्वार खोलता है।

तात्पर्य:
भगवान अर्जुन को प्रेरित कर रहे हैं कि यह धर्मयुद्ध कोई अपराध नहीं, बल्कि सौभाग्य है। जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही दिव्यता की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक 33

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ 33 ॥

भावार्थ:
यदि तू इस धर्मयुद्ध को नहीं करेगा, तो तू अपना धर्म और कीर्ति दोनों खो देगा और पाप का भागी बनेगा।

तात्पर्य:
कर्तव्य से पलायन केवल कायरता नहीं, यह पाप भी है। भगवान स्पष्ट कर रहे हैं — धर्म के मार्ग से हटने वाला व्यक्ति न संसार में सुख पाता है, न परलोक में।

श्लोक 34

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ 34 ॥

भावार्थ:
लोग तेरी निंदा करेंगे, और जो आदरणीय व्यक्ति है, उसके लिए अपयश मृत्यु से भी बड़ा होता है।

तात्पर्य:
सम्मान मनुष्य का दूसरा जीवन है। अर्जुन जैसे वीर के लिए अपयश ही सबसे बड़ी मृत्यु है। भगवान कह रहे हैं — यदि तू युद्ध से भागेगा, तो इतिहास में अपमानित रहेगा।

श्लोक 35–36

भयाद्रणादुपरतमं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ 35 ॥
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ 36 ॥

भावार्थ:
महारथी सोचेंगे कि तू भय से युद्ध छोड़ गया, और तेरे शत्रु तेरी निंदा करेंगे — तेरे सामर्थ्य पर हँसेंगे। इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है?

तात्पर्य:
श्रीकृष्ण अब अर्जुन के योद्धा स्वभाव को संबोधित कर रहे हैं। वीर के लिए सबसे बड़ा अपमान है — कायरता की छाप। भगवान उसे प्रेरित कर रहे हैं कि धर्मयुद्ध से पीछे हटना केवल पाप नहीं, अपयश का कारण भी है।

Also Read

https://sanatanrahasya.com/bhagavad-gita-chapter-1-arjuna-vishada-yoga