गोरखनाथ मंदिर

गोरखनाथ मंदिर: भारतीय अध्यात्म, योग परंपरा और आस्था का महाकुंभ

गोरखनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है और नाथ संप्रदाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

एक मंदिर, एक शहर और एक जीवंत परंपरा उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में स्थित गोरखपुर शहर अपनी पहचान के लिए किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लेकिन इस शहर के नाम और अस्तित्व के पीछे जो सबसे बड़ी शक्ति है, वह है— श्री गोरखनाथ मंदिर। यह केवल ईंट-पत्थरों से निर्मित एक स्थापत्य नहीं है, बल्कि यह ‘नाथ संप्रदाय’ का वह वैश्विक केंद्र है जहाँ से हठयोग, साधना और सामाजिक समरसता की धारा पूरे विश्व में प्रवाहित होती है।

अक्सर जब लोग गूगल पर इस मंदिर के बारे में खोजते हैं, तो उन्हें केवल तारीखें और नाम मिलते हैं। लेकिन इस लेख में हम उस ‘अनुभव’ और ‘रहस्य’ की बात करेंगे जो एक श्रद्धालु यहाँ की मिट्टी में महसूस करता है।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: त्रेतायुग से आधुनिक काल तक का सफर

गोरखनाथ मंदिर का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना कि भारत की योग परंपरा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने ‘मत्स्येंद्रनाथ’ के रूप में अवतार लिया और उनके परम शिष्य हुए गुरु गोरखनाथ

राप्ती के तट पर तपस्या

मान्यता है कि त्रेतायुग में जब गुरु गोरखनाथ भ्रमण करते हुए इस क्षेत्र में आए, तो उन्हें राप्ती नदी का तट अत्यंत शांत और साधना के योग्य लगा। उन्होंने यहीं अपना ‘धुना’ (पवित्र अग्नि) प्रज्वलित किया। आज जहाँ मुख्य मंदिर खड़ा है, वहीं कभी गुरु गोरखनाथ की साधना स्थली हुआ करती थी।

विदेशी आक्रमण और पुनरुत्थान

इतिहास गवाह है कि इस मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। खिलजी वंश से लेकर औरंगजेब के शासनकाल तक, इस मंदिर को कई बार ध्वस्त करने का प्रयास किया गया। लेकिन नाथ संप्रदाय के योगियों की अटूट श्रद्धा और स्थानीय जनता के संघर्ष ने हर बार इसे और भव्य रूप में पुनर्जीवित किया। आधुनिक मंदिर का जो ढांचा हम आज देखते हैं, उसे ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी और महंत अवेद्यनाथ जी के नेतृत्व में विस्तार और सुंदरता दी गई।

2. नाथ पंथ का दर्शन: “अलख निरंजन” का घोष

अक्सर लोग मंदिर जाते हैं, लेकिन वहां की विचारधारा को नहीं समझ पाते। गोरखनाथ मंदिर ‘नाथ संप्रदाय’ का मुख्यालय है। इस पंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जाति-पाति, छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को नहीं मानता।

यहाँ का मूल मंत्र है— “स्वयं को जानो”। हठयोग के माध्यम से शरीर और मन को शुद्ध करना और शून्य में परमात्मा का अनुभव करना ही यहाँ की मुख्य शिक्षा है। मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए योगियों के चित्र और मंत्र आपको एक अलग ही मानसिक शांति का अनुभव कराते हैं।

3. मंदिर परिसर की बनावट और मुख्य दर्शनीय स्थल

यदि आप पहली बार गोरखनाथ मंदिर जा रहे हैं, तो आप इसकी विशालता देखकर अचंभित रह जाएंगे। करीब 52 एकड़ में फैला यह परिसर अपने आप में एक लघु शहर है।

मुख्य मंदिर (गर्भगृह)

मंदिर का मुख्य आकर्षण गुरु गोरखनाथ की प्रतिमा है। यहाँ की प्रतिमा सफेद संगमरमर की है, जिसमें गुरु गोरखनाथ ध्यान की मुद्रा में बैठे हैं। उनकी आँखों में एक ऐसी शांति है जो आपकी आत्मा तक उतर जाती है। प्रतिमा के पास ही उनकी ‘चरण पादुका’ रखी गई है, जिसकी पूजा विशेष रूप से की जाती है।

अखण्ड धूना: सदियों से जलती आग

मंदिर के दक्षिण कक्ष में एक ‘धूना’ है। कहा जाता है कि यह अग्नि गुरु गोरखनाथ के समय से ही प्रज्वलित है। यहाँ की भस्म (विभूति) को श्रद्धालु अपने माथे पर लगाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस भस्म में बीमारियों और मानसिक कष्टों को दूर करने की शक्ति है।

भीम सरोवर: जहाँ भीम का गर्व चूर हुआ

मंदिर परिसर के भीतर एक विशाल सरोवर है जिसे ‘भीम सरोवर’ कहा जाता है। इसके पीछे एक रोचक कथा है। कहा जाता है कि महाभारत काल में भीम जब अपनी शक्ति के मद में चूर थे, तब उनकी भेंट यहाँ एक वृद्ध योगी (गुरु गोरखनाथ) से हुई। भीम उस वृद्ध योगी का पैर तक नहीं उठा सके। अंततः उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने इसी सरोवर में स्नान कर अपनी अशुद्धियों को धोया। आज यहाँ शाम के समय चलने वाले ‘साउंड एंड लाइट शो’ के जरिए इस इतिहास को जीवंत किया जाता है।

4. नेपाल का गहरा संबंध: एक अनूठी परंपरा

गोरखनाथ मंदिर का अंतरराष्ट्रीय महत्व भी है। भारत और नेपाल के संबंधों की डोर यहाँ से जुड़ी है। नेपाल के राजपरिवार में गुरु गोरखनाथ को ‘कुलदेवता’ माना जाता है।

  • नेपाली मुद्रा: नेपाल के पुराने सिक्कों पर गुरु गोरखनाथ का नाम और उनकी पादुका अंकित होती थी।
  • खिचड़ी परंपरा: हर साल मकर संक्रांति पर पहली खिचड़ी नेपाल के राजपरिवार की ओर से ही भेजी जाती है, जिसके बाद ही मंदिर में आम जनता की खिचड़ी स्वीकार की जाती है। यह परंपरा सदियों से अटूट है।

5. मकर संक्रांति और विश्व प्रसिद्ध ‘खिचड़ी मेला’

अगर आप गोरखपुर की असली संस्कृति देखना चाहते हैं, तो आपको मकर संक्रांति के दौरान यहाँ आना चाहिए। यह उत्तर भारत के सबसे बड़े मेलों में से एक है।

क्यों चढ़ाई जाती है खिचड़ी?

इसके पीछे एक अत्यंत मानवीय कहानी है। गुरु गोरखनाथ जब हिमाचल के ज्वाला देवी गए, तो वहां के पुजारियों ने उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया। गुरु गोरखनाथ ने कहा कि वे केवल भिक्षा में मिली खिचड़ी ही खाते हैं। उन्होंने अपना ‘अक्षय पात्र’ (खप्पर) वहां रखा, लेकिन वह कभी भरा ही नहीं। अंत में वे गोरखपुर आए और यहाँ के लोगों ने प्रेम से जो खिचड़ी दी, उससे वह पात्र भर गया। तब से यह परंपरा बन गई कि जो भी भक्त यहाँ खिचड़ी अर्पित करेगा, उसका भंडार कभी खाली नहीं रहेगा।

इस मेले में केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि बिहार, नेपाल और मध्य प्रदेश से भी लाखों लोग आते हैं। पूरा परिसर “जय गोरख” के नारों से गूँज उठता है।

6. सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में भूमिका

गूगल एडसेंस के लिए यह सेक्शन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मंदिर की एक नई छवि पेश करता है। गोरखनाथ मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं है, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का केंद्र है।

  • शिक्षा का प्रसार: मंदिर द्वारा संचालित ‘महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद’ के तहत दर्जनों स्कूल, इंटर कॉलेज और विश्वविद्यालय चलाए जाते हैं।
  • स्वास्थ्य सेवा: गुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय पूर्वांचल के सबसे सस्ते और बेहतरीन अस्पतालों में गिना जाता है, जहाँ बिना किसी भेदभाव के हर गरीब का इलाज होता है।
  • गौशाला: मंदिर की अपनी विशाल गौशाला है जहाँ सैकड़ों गायों की सेवा की जाती है। यहाँ का दूध और घी शुद्धता की मिसाल माना जाता है।

7. राजनीति और पीठाधीश्वर की भूमिका

गोरखनाथ पीठ के महंत समय-समय पर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे हैं। वर्तमान में इस पीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ हैं, जिनके नेतृत्व में मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में कई विकास कार्य हुए हैं।

गोरखनाथ मंदिर का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। इस पीठ के महंत हमेशा से जनसेवा में सक्रिय रहे हैं। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी से लेकर महंत अवेद्यनाथ जी तक, सभी ने संसद में जनता की आवाज उठाई। वर्तमान में यहाँ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ हैं, जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं। उनके कार्यकाल में मंदिर और गोरखपुर का कायाकल्प हुआ है, जिससे यहाँ धार्मिक पर्यटन (Religious Tourism) में भारी वृद्धि हुई है।

8. यात्रियों के लिए उपयोगी जानकारी (Traveler’s Guide)

दर्शन का सबसे अच्छा समय

  • महीना: अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे सुखद होता है।
  • विशेष अवसर: मकर संक्रांति (14-15 जनवरी) सबसे भव्य समय है, लेकिन इस दौरान बहुत भीड़ होती है।

कैसे पहुँचें?

  1. हवाई मार्ग: गोरखपुर का अपना एयरपोर्ट है जो दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
  2. रेल मार्ग: गोरखपुर जंक्शन उत्तर-पूर्व रेलवे का मुख्यालय है और दुनिया के सबसे लंबे प्लेटफार्मों में से एक यहाँ है।
  3. सड़क मार्ग: वाराणसी, लखनऊ और कुशीनगर से सीधी बस सेवा उपलब्ध है।

ठहरने की व्यवस्था

मंदिर परिसर के भीतर यात्रियों के लिए ‘यात्री निवास’ बने हुए हैं, जो बहुत कम दरों पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा मंदिर के आसपास कई निजी होटल्स और गेस्ट हाउस भी हैं।

9. मंदिर दर्शन के कुछ नियम और सुझाव

  • साफ-सफाई: मंदिर परिसर में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। प्लास्टिक का उपयोग वर्जित है।
  • फोटोग्राफी: मुख्य गर्भगृह के भीतर फोटो लेना मना है, हालांकि परिसर के बाहर आप तस्वीरें ले सकते हैं।
  • समय का निवेश: कम से कम 3-4 घंटे का समय लेकर आएं ताकि आप भीम सरोवर, गौशाला और विभिन्न मंदिरों का सुकून से दर्शन कर सकें।

10. निष्कर्ष: आस्था और शांति का अंतिम पड़ाव

गोरखनाथ मंदिर के बारे में कितना भी लिखा जाए, वह कम है। यह वह स्थान है जहाँ पहुँचकर अमीर और गरीब, राजा और रंक सब एक ही कतार में खड़े होकर ‘खिचड़ी’ चढ़ाते हैं। यह समानता का वह संदेश है जिसकी आज दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है।

यदि आप भागदौड़ भरी जिंदगी से थक चुके हैं और मानसिक शांति के साथ-साथ भारतीय संस्कृति की गहराई को समझना चाहते हैं, तो गोरखपुर का यह गोरखनाथ मंदिर आपका स्वागत करने के लिए तैयार है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: गोरखनाथ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
उत्तर: गोरखनाथ मंदिर दर्शन के लिए अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। यदि आप सांस्कृतिक अनुभव लेना चाहते हैं, तो मकर संक्रांति (14 जनवरी) के समय आएं, जब यहाँ प्रसिद्ध खिचड़ी मेला आयोजित होता है।

प्रश्न 2: क्या गोरखनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए कोई शुल्क है?
उत्तर: नहीं, गोरखनाथ मंदिर में प्रवेश और दर्शन पूरी तरह से नि:शुल्क है। श्रद्धालुओं से किसी प्रकार का प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता।

प्रश्न 3: क्या मंदिर परिसर के भीतर फोटोग्राफी की अनुमति है?
उत्तर: मंदिर परिसर के बाहरी हिस्सों में फोटोग्राफी की अनुमति है, लेकिन मुख्य गर्भगृह के भीतर फोटो लेना निषिद्ध है।

प्रश्न 4: गोरखनाथ मंदिर का योगी आदित्यनाथ से क्या संबंध है?
उत्तर: योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर के वर्तमान पीठाधीश्वर हैं और नाथ संप्रदाय की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।

प्रश्न 5: मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने का क्या महत्व है?
उत्तर: खिचड़ी चढ़ाना गोरखनाथ मंदिर की प्रमुख परंपरा है। भक्त मन्नत पूरी होने या सुख-समृद्धि की कामना से खिचड़ी अर्पित करते हैं। यह परंपरा मकर संक्रांति के खिचड़ी मेले से विशेष रूप से जुड़ी हुई है।

प्रश्न 6: क्या मंदिर के पास ठहरने की व्यवस्था उपलब्ध है?
उत्तर: हाँ, मंदिर परिसर में यात्री निवास उपलब्ध हैं जहाँ कम शुल्क पर ठहरने की सुविधा मिल जाती है। इसके अलावा आसपास कई होटल और गेस्ट हाउस भी मौजूद हैं।

प्रश्न 7: गोरखनाथ मंदिर के पास घूमने की जगहें कौन-सी हैं?
उत्तर: गोरखनाथ मंदिर के पास कुशीनगर, मगहर और गीता प्रेस जैसे प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल स्थित हैं।

प्रश्न 8: क्या अन्य धर्मों के लोग मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, गोरखनाथ मंदिर सभी धर्मों और समुदायों के लोगों के लिए खुला है। यहाँ सभी श्रद्धालु शांतिपूर्वक दर्शन कर सकते हैं।

आशा है कि यह विस्तृत लेख आपके पाठकों को मंदिर की भव्यता और इतिहास से पूरी तरह अवगत कराएगा।