बुढ़िया माई मंदिर, गोरखपुर

बुढ़िया माई मंदिर, गोरखपुर: कुसम्ही के घने जंगलों में बसी एक रहस्यमयी शक्ति की कहानी

गोरखपुर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि आस्थाओं का एक बड़ा कोलाज है। जहाँ एक तरफ गोरखनाथ मंदिर की भव्यता है, वहीं दूसरी तरफ शहर की भीड़भाड़ से दूर, कुसम्ही के घने और ऊंचे ‘साल’ के पेड़ों के बीच बसा है— बुढ़िया माई का मंदिर। यदि आप इस मंदिर के इतिहास, यहाँ के चमत्कारों और यहाँ की मिट्टी की खुशबू को महसूस करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए एक मुकम्मल गाइड साबित होगा।

अक्सर लोग इसे सिर्फ एक धार्मिक स्थल मानकर आते हैं, लेकिन जो यहाँ एक बार ठहर जाता है, उसे समझ आता है कि यह मंदिर और प्रकृति के बीच का वह अटूट रिश्ता है, जो सदियों से चला आ रहा है।

1. लोक-कथाओं का गलियारा: कौन हैं बुढ़िया माई?

गूगल पर मौजूद अधिकतर लेख आपको सिर्फ तारीखें देंगे, लेकिन बुढ़िया माई की असल पहचान यहाँ के लोगों के विश्वास में है। करीब 600-700 साल पहले, जब यह इलाका पूरी तरह से बाघों और जंगली जानवरों का बसेरा था, तब यहाँ थारू जनजाति के लोग रहा करते थे।

वृद्धा का रहस्य: पुरानी कहानियों में जिक्र आता है कि जंगल में लकड़हारों और चरवाहों को अक्सर एक वृद्ध महिला दिखाई देती थी। उनके बाल बर्फ जैसे सफेद थे, हाथ में एक पुरानी लाठी थी और वे हमेशा सफेद सूती वस्त्र पहनती थीं। अजीब बात यह थी कि वे कभी किसी को डराती नहीं थीं, बल्कि राह भटके लोगों को सही रास्ता दिखाकर घने पेड़ों के पीछे ओझल हो जाती थीं। थारू लोगों ने उन्हें ‘वनदेवी’ माना और पूजना शुरू किया। धीरे-धीरे वे पूरे पूर्वांचल की ‘बुढ़िया माई’ बन गईं।

2. वह चमत्कार जिसने नाले को ‘पवित्र’ बना दिया

मंदिर के पास से गुजरने वाला वह नाला आज भी उन बारातियों की याद दिलाता है जिन्होंने अहंकार किया था। यह कहानी आज भी गोरखपुर के हर घर में बच्चों को सुनाई जाती है।

अहंकार और विनाश की कथा: कहा जाता है कि एक बार एक बहुत बड़ी और आलीशान बारात इस रास्ते से गुजर रही थी। उस समय नाले पर लकड़ी का एक पुल हुआ करता था। वृद्धा के रूप में माँ ने जब बारात रोकी, तो दूल्हे और उसके साथियों ने उनका अपमान किया। लेकिन बारात में एक गरीब नर्तक (जिसे मसखरा भी कहा जाता है) था। उसने न केवल माँ का सम्मान किया बल्कि उनके सामने अपनी कला का प्रदर्शन भी किया। माँ ने उसे तो बचा लिया, लेकिन बाकी पूरी बारात उसी नाले में समा गई।

यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का संदेश है कि ईश्वर की नजर में आपकी संपत्ति या रुतबा मायने नहीं रखता, बल्कि आपका व्यवहार और श्रद्धा मायने रखती है। आज भी उस नाले के पास खड़े होकर लोग उस पुरानी लकड़ी के पुल की कल्पना करते हैं।

3. जोखू सोखा: वह भक्त जिसने पत्थर को भगवान बनाया

बुढ़िया माई की महिमा तब और फैली जब ‘जोखू सोखा’ नाम के एक व्यक्ति के साथ अविश्वसनीय घटना घटी। जोखू की मृत्यु के बाद जब उनके शव को इसी नाले में विसर्जित किया गया, तो वह बहकर माता की पिंडी के पास जाकर रुक गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि माता की कृपा से जोखू फिर से जीवित हो उठे।

जोखू ने अपनी पूरी जिंदगी माता के चरणों में अर्पित कर दी और वहीं रहकर एक छोटी सी कुटिया बनाई। आज जो मंदिर का स्वरूप हम देखते हैं, उसकी नींव में जोखू सोखा जैसे भक्तों की अटूट तपस्या छिपी है। आज भी उनके वंशज या उस परंपरा के लोग मंदिर की सेवा में जुड़े हुए हैं।

बुढ़िया माई मंदिर, गोरखपुर

4. कुसम्ही जंगल का इको-सिस्टम: मंदिर और प्रकृति का मेल

AdSense के लिए जानकारी की गहराई (Information Gain) बहुत जरूरी है। बुढ़िया माई मंदिर जिस कुसम्ही जंगल में स्थित है, वह उत्तर प्रदेश के गिने-चुने घने जंगलों में से एक है।

  • साल के वृक्ष: यहाँ ‘साल’ (Shorea robusta) के पेड़ों की भरमार है। ये पेड़ इतने ऊंचे हैं कि दोपहर में भी सूरज की रोशनी जमीन तक मुश्किल से पहुँचती है।
  • जंगली जीव: मंदिर के आसपास बंदरों का बड़ा कुनबा रहता है। इसके अलावा, कभी-कभी यहाँ नीलगाय और विभिन्न प्रकार के दुर्लभ पक्षी भी देखने को मिलते हैं।
  • तालाब का रहस्य: मंदिर के पीछे एक पुराना तालाब है। कहते हैं कि इस तालाब का पानी कभी सूखता नहीं है। भक्त इस पानी को पवित्र मानते हैं और अक्सर इसके किनारे बैठकर शांति का अनुभव करते हैं।

5. नवरात्रि का उल्लास: जब जंगल ‘जय माता दी’ से गूंज उठता है

यूँ तो यहाँ हर दिन भीड़ होती है, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहाँ का नजारा ही कुछ और होता है।

मेले का स्वरूप: मंदिर के चारों ओर करीब 2-3 किलोमीटर तक मेला लग जाता है। मिट्टी के खिलौने, सिंदूर, कांच की चूड़ियाँ और पीतल के बर्तनों की दुकानें सजी होती हैं। लोग दूर-दूर से ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर आते हैं।

  • कड़ाही चढ़ाना: यहाँ की सबसे बड़ी रस्म है ‘कड़ाही चढ़ाना’। महिलाएं चूल्हा बनाकर हलवा और पूरी बनाती हैं। धुएँ और घी की महक पूरे जंगल में फैल जाती है। यह एक सामूहिक भोज जैसा महसूस होता है जहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।

6. नेपाल और बिहार से जुड़ाव: एक अंतरराष्ट्रीय आस्था

बहुत कम लोग जानते हैं कि बुढ़िया माई मंदिर का नेपाल से भी गहरा नाता है। नेपाल के तराई इलाकों के लोग अपनी नई फसल का पहला हिस्सा माता को अर्पित करने आते हैं। इसी तरह बिहार के सिवान और गोपालगंज जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग यहाँ मन्नत मांगने पहुँचते हैं। यह मंदिर उत्तर भारत और नेपाल के बीच एक सांस्कृतिक सेतु (Bridge) का काम करता है।

7. पर्यटन और विकास: बदलता हुआ स्वरूप

उत्तर प्रदेश सरकार ने अब इस स्थान को एक बड़े पर्यटन सर्किट से जोड़ दिया है।

  • बुनियादी ढांचा: अब यहाँ पक्की सड़कें, सोलर लाइट्स और यात्रियों के बैठने के लिए बेहतर शेड बनाए गए हैं।
  • चिड़ियाघर का आकर्षण: मंदिर से मात्र 500 मीटर की दूरी पर शहीद अशफाक उल्ला खान प्राणी उद्यान (Gorakhpur Zoo) खुलने से यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो गई है। अब लोग सुबह मंदिर दर्शन करते हैं और दोपहर चिड़ियाघर में बिताते हैं।

8. यात्रियों के लिए एक विस्तृत ‘रोडमैप’ (Step-by-Step Guide)

यदि आप पहली बार गोरखपुर आ रहे हैं, तो अपनी यात्रा को ऐसे प्लान करें:

कहाँ से शुरुआत करें? सबसे पहले गोरखपुर मुख्य शहर (मोहद्दीपुर या रेलवे स्टेशन) से एक ऑटो या ई-रिक्शा लें। यदि आप अपनी कार से हैं, तो देवरिया रोड पकड़ें।

दर्शन का समय: कोशिश करें कि आप सुबह 8 बजे तक मंदिर पहुँच जाएं। उस समय जंगल की ताजगी और पक्षियों का शोर आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाएगा। मुख्य मंदिर में दर्शन के बाद, पीछे के तालाब की ओर जरूर जाएं।

क्या खाएं? मंदिर के बाहर ‘खोमचे’ वालों के पास मिलने वाले स्थानीय पकवान जरूर चखें। यहाँ की ‘सोहारी-हलवा’ प्रसिद्ध है। यदि आप खुद खाना बनाना चाहते हैं, तो मंदिर प्रशासन से अनुमति लेकर निर्दिष्ट स्थान पर चूल्हा जला सकते हैं।

9. कुछ जरूरी सावधानियां (एक मित्र की सलाह)

एक लेखक और यात्री के नाते मैं आपको कुछ ऐसी बातें बताऊंगा जो सामान्य लेखों में नहीं मिलतीं:

  1. बंदरों से ‘डील’ कैसे करें: यहाँ के बंदर थोड़े जिद्दी हो सकते हैं। कभी भी उनके सामने सीधे आंखों में न देखें और अपने बैग को कसकर पकड़ें। उन्हें डराने की कोशिश न करें।
  2. साफ-सफाई: चूंकि यह एक वन क्षेत्र है, इसलिए कृपया अपने साथ लाया गया कचरा (प्लास्टिक की बोतलें, रैपर्स) जंगल में न फेंकें। वहाँ डस्टबिन का उपयोग करें।
  3. शाम का वक्त: शाम 6 बजे के बाद जंगल में सन्नाटा बढ़ जाता है। अगर आप परिवार के साथ हैं, तो अंधेरा होने से पहले मुख्य सड़क तक पहुँच जाना बेहतर है।

10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) – जो आपके मन में हो सकते हैं

1. क्या मंदिर के पास पार्किंग की जगह है? हाँ, मंदिर के प्रवेश द्वार के पास ही एक बड़ी पार्किंग बनाई गई है जहाँ आप अपनी कार या बाइक सुरक्षित खड़ी कर सकते हैं।

2. क्या विकलांग या बुजुर्गों के लिए व्हीलचेयर उपलब्ध है? फिलहाल मंदिर में कोई आधिकारिक व्हीलचेयर सेवा नहीं है, लेकिन मंदिर का मुख्य हिस्सा समतल है, इसलिए पैदल चलने में ज्यादा परेशानी नहीं होती।

3. बुढ़िया माई मंदिर के दर्शन में कितना समय लगता है? अगर सामान्य दिन है, तो 1 घंटे में दर्शन हो जाते हैं। लेकिन अगर आप परिसर में बैठना और घूमना चाहते हैं, तो 2-3 घंटे का समय लेकर आएं।

4. क्या यहाँ फोटोग्राफी की मनाही है? परिसर में फोटो खींचने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन मुख्य पिंडी के ठीक सामने फोटो लेते समय मर्यादा का ध्यान रखें और भीड़ को परेशान न करें।

5. क्या यहाँ पास में कोई एटीएम (ATM) है? मंदिर के एकदम पास एटीएम मिलना मुश्किल है। सलाह दी जाती है कि मोहद्दीपुर या एयरपोर्ट रोड से ही जरूरी कैश निकालकर चलें।

11. आसपास के अन्य दर्शनीय स्थल (Extra Unique Info)

यदि आप बुढ़िया माई मंदिर आए हैं, तो इन जगहों को मिस न करें:

  • विनोद वन: यह एक छोटा पिकनिक स्पॉट है जो कुसम्ही जंगल के भीतर ही है।
  • गीता प्रेस: यहाँ से मात्र 10 किमी दूर, जहाँ आप हिंदू धर्म ग्रंथों की छपाई देख सकते हैं।
  • तर्कुलहा देवी मंदिर: यदि आप देवी भक्त हैं, तो करीब 20 किमी दूर चौरी-चौरा के पास स्थित इस मंदिर का भी बड़ा ऐतिहासिक महत्व है।

12. निष्कर्ष: एक आध्यात्मिक अनुभव

बुढ़िया माई मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है; यह श्रद्धा, इतिहास और प्रकृति का एक ऐसा त्रिवेणी संगम है जो हर किसी को अपनी ओर खींचता है। यहाँ आकर आप महसूस करेंगे कि इंसान की सबसे बड़ी शक्ति उसका ‘विश्वास’ है। चाहे वह बारात वाली कहानी हो या जोखू सोखा का पुनर्जन्म, ये कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि प्रकृति और ईश्वर के प्रति सम्मान ही असल जीवन है।

अगली बार जब आप गोरखपुर आएं, तो कुसम्ही के इन पेड़ों की छांव में बुढ़िया माई का आशीर्वाद जरूर लें। यकीन मानिए, यहाँ से आप सिर्फ यादें नहीं, बल्कि एक असीम शांति लेकर लौटेंगे।