पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार की सीमा पर, छोटी गंडक नदी के शांत किनारे बसा सोहगरा धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि लोकआस्था, पौराणिक इतिहास और ग्रामीण संस्कृति का जीवंत संगम है। देवरिया जिले के अंतिम छोर पर स्थित यह धाम एक अनोखी भौगोलिक विशेषता भी रखता है—मंदिर का कुछ भाग उत्तर प्रदेश में और कुछ हिस्सा बिहार की सीमा में पड़ता है। यही कारण है कि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को दो राज्यों की सांस्कृतिक छाप एक साथ देखने को मिलती है।
सावन के महीने में जब हर दिशा से “बम-बम भोले” की गूंज उठती है, तो पूरा क्षेत्र शिवमय हो जाता है। लेकिन इस धाम की असली खूबसूरती भीड़ में नहीं, बल्कि उस सादगी में है जो गाँवों की मिट्टी से निकलकर सीधे मन को छू जाती है।

द्वापर युग से जुड़ी प्राचीन मान्यता
स्थानीय कथाओं के अनुसार, इस स्थान की स्थापना द्वापर युग में राक्षसराज बाणासुर द्वारा की गई थी। बाणासुर भगवान शिव का परम भक्त था। कहा जाता है कि उसने सेंधोर पर्वत क्षेत्र में घोर तपस्या की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और यहाँ एक विशाल शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए।
मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग लगभग साढ़े आठ फीट ऊँचा और अत्यंत प्रभावशाली है। श्रद्धालु इसे स्वयंभू मानते हैं। मान्यता है कि इस शिवलिंग की जड़ें धरती की गहराई तक जाती हैं।
उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा का साक्षी
बाणासुर की पुत्री उषा भी भगवान शिव की उपासिका थी। कथा है कि उसने यहीं पूजा-अर्चना की और शिवकृपा से उसकी भेंट श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुई। दोनों के प्रेम और विवाह की कथा इस भूमि से जुड़ी मानी जाती है।
आज भी अविवाहित युवतियाँ यहाँ सोमवार को विशेष पूजा करती हैं। वे मानती हैं कि जैसे उषा को मनचाहा वर मिला, वैसे ही उनकी भी मनोकामना पूर्ण होगी। यह विश्वास पीढ़ियों से चला आ रहा है और हर सावन में इसकी झलक स्पष्ट दिखाई देती है।
संतान प्राप्ति की आस्था
इस धाम की एक और विशेष पहचान है—संतान प्राप्ति के लिए की जाने वाली पूजा। काशी नरेश हंस ध्वज की कथा यहाँ खूब सुनाई जाती है। कहा जाता है कि उन्होंने संतान की कामना से यहाँ पूजा की और उनकी इच्छा पूरी हुई। तभी से मंदिर का नाम बाबा हंसनाथ पड़ा।
आज भी निःसंतान दंपति यहाँ आकर जलाभिषेक करते हैं, व्रत रखते हैं और मन्नत मानते हैं। कई परिवार वर्षों बाद भी अपने बच्चों को लेकर धन्यवाद देने आते हैं।
अंग्रेजों की खुदाई और अटूट आस्था
स्थानीय लोगों के अनुसार, अंग्रेजी शासनकाल में अधिकारियों ने इस शिवलिंग की गहराई जानने के लिए खुदाई करवाई थी। काफी नीचे तक खुदाई करने के बाद भी शिवलिंग का अंत नहीं मिला। अंततः प्रयास रोक दिया गया।
यह प्रसंग आज भी लोगों के बीच श्रद्धा का विषय है। भक्त इसे शिव की अनंत शक्ति का प्रतीक मानते हैं।

छोटी गंडक नदी का आध्यात्मिक महत्व
मंदिर के निकट बहती छोटी गंडक नदी इस धाम को प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करती है। सुबह के समय नदी किनारे की ठंडी हवा और मंदिर की घंटियों की ध्वनि मिलकर ऐसा वातावरण बनाती है, जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल है।
यहाँ एक प्राचीन पोखरा भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका जल रोगों से मुक्ति देता है। सावन और महाशिवरात्रि पर श्रद्धालु पहले स्नान करते हैं और फिर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं।
सावन का मेला और कांवर यात्रा
सावन के महीने में यह धाम पूरी तरह बदल जाता है। यूपी, बिहार और नेपाल से हजारों कांवरिए जल लेकर पैदल यात्रा करते हुए यहाँ पहुँचते हैं। रास्तों पर भक्ति गीत, ढोल-नगाड़े और नारों की गूंज वातावरण को उत्सव में बदल देती है।
महाशिवरात्रि पर यहाँ विशाल मेला लगता है। स्थानीय दुकानदारों, मिठाई वालों और खिलौने बेचने वालों के लिए यह समय वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण अवसर होता है।
ग्रामीण संस्कृति की झलक
सोहगरा धाम का सबसे खूबसूरत पक्ष इसकी ग्रामीण आत्मा है। यहाँ आने पर आपको भव्य आधुनिक निर्माण नहीं, बल्कि मिट्टी की सोंधी खुशबू, खेतों की हरियाली और सरल जीवन शैली दिखाई देगी।
मंदिर के आसपास के गाँवों में आज भी लोग पारंपरिक वेशभूषा में पूजा करने आते हैं। महिलाएँ समूह में भजन गाती हैं और पुरुष सामूहिक रूप से रुद्राभिषेक कराते हैं।
वास्तुकला और संरचना
मंदिर का मुख्य ढांचा ऊँचाई पर स्थित है। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जैसे-जैसे आप ऊपर जाते हैं, सामने खुला आकाश और दूर तक फैले खेत दिखाई देते हैं। गर्भगृह अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन शिवलिंग का आकार उसे अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।
समय-समय पर स्थानीय श्रद्धालुओं और प्रशासन की सहायता से मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा है, लेकिन मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है।
सीमावर्ती सांस्कृतिक समन्वय
यह धाम दो राज्यों की सीमा पर होने के कारण सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक है। यहाँ यूपी और बिहार दोनों की परंपराएँ देखने को मिलती हैं। पूजा-पद्धति, भाषा और लोकगीतों में दोनों क्षेत्रों की झलक मिलती है।
त्योहारों के समय दोनों राज्यों के प्रशासनिक अधिकारी मिलकर व्यवस्था संभालते हैं। यह सहयोग इस स्थल को और भी विशेष बनाता है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
सावन और मेले के दौरान हजारों लोगों के आने से आसपास के गाँवों की अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिलता है। छोटे दुकानदार, फूल-माला बेचने वाले, प्रसाद विक्रेता और वाहन चालक—सभी के लिए यह समय कमाई का अवसर होता है।
कई परिवारों की साल भर की आय का बड़ा हिस्सा इसी समय से आता है।
यात्रा मार्गदर्शिका
सड़क मार्ग से पहुँचना सबसे आसान है। सिवान, देवरिया या लार रोड से यहाँ बस या निजी वाहन द्वारा आया जा सकता है। निकटतम रेलवे स्टेशन सिवान है।
यात्रा का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक माना जाता है, जब मौसम सुहावना रहता है। हालांकि सावन में आने का अनुभव अलग ही होता है, लेकिन भीड़ अधिक रहती है।
आध्यात्मिक अनुभव
सोहगरा धाम की सबसे बड़ी विशेषता उसका शांत वातावरण है। सुबह की आरती में शामिल होकर जब धूप की पहली किरण शिवलिंग पर पड़ती है, तो मन स्वतः ही ध्यानमग्न हो जाता है।
यहाँ की शांति किसी बड़े तीर्थ की चहल-पहल से अलग है। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ आप बैठकर कुछ देर स्वयं से संवाद कर सकते हैं।
स्थानीय जीवन और अर्थव्यवस्था
सावन और मेले के समय हजारों श्रद्धालुओं के आने से आसपास के गाँवों की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है।
फूल-माला बेचने वाले, प्रसाद विक्रेता, चाय-नाश्ते की दुकानें और वाहन चालक—सभी के लिए यह समय महत्वपूर्ण होता है।
यह धाम केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन का सहारा भी है।
यहाँ बिताया गया एक दिन
यदि आप सुबह-सुबह यहाँ पहुँचें, तो मंदिर की आरती में शामिल हो सकते हैं। आरती के समय घंटियों की आवाज और मंत्रोच्चार मन को गहराई से छूते हैं।
दिन में आप नदी किनारे बैठ सकते हैं। शाम को सूर्यास्त के समय मंदिर का दृश्य बेहद शांत और सुंदर होता है।
यहाँ बैठकर कुछ देर ध्यान करना जीवन की भागदौड़ से राहत देता है।
यात्रा मार्गदर्शिका
सड़क मार्ग से पहुँचना आसान है। सिवान, देवरिया और लार रोड से वाहन उपलब्ध हैं।
अक्टूबर से मार्च का समय यात्रा के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। सावन में आने का अनुभव अलग है, लेकिन भीड़ अधिक रहती है।
क्यों खास है सोहगरा धाम?
यहाँ की खासियत इसकी सादगी है। यह धाम याद दिलाता है कि आस्था केवल भव्यता में नहीं, बल्कि सच्चे विश्वास में होती है।
यहाँ आकर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किसी पुराने समय में लौट आए हों—जहाँ भक्ति सरल थी, जीवन सहज था और मन शांत था।
निष्कर्ष
सोहगरा धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और लोकजीवन का जीवंत केंद्र है। द्वापर युग की कथाओं से लेकर आज के सावन मेले तक, यह स्थान समय के साथ चलता रहा है, लेकिन अपनी आत्मा को सुरक्षित रखे हुए है।
यदि आप भीड़भाड़ से दूर किसी ऐसे शिवधाम की तलाश में हैं जहाँ भक्ति के साथ सादगी और शांति का अनुभव हो, तो यह स्थान अवश्य देखें। यहाँ की मिट्टी, यहाँ की हवा और यहाँ की आस्था—सब मिलकर ऐसा अनुभव देती है जो लंबे समय तक स्मृति में बना रहता है।
हर-हर महादेव।
